मुजफ्फरपुर से विशाल कुमार:-बिहार के मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज में लगा हुआ पेड़ बन रहा आकर्षण का केंद्र ,यह कल्पवृक्ष स्वर्ग का एक विशेष वृक्ष है । बता दे कि पौराणिक धर्मग्रंथों और हिन्दू मान्यताओं के अनुसार भी यह माना जाता है कि इस वृक्ष के नीचे बैठकर व्यक्ति जो भी इच्छा करता है और वह भी पूर्ण हो जाती है, क्योंकि इस वृक्ष में अपार सकारात्मक ऊर्जा होती है।
मिली जानकारी में पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन के 14 रत्नों में से एक कल्पवृक्ष की भी उत्पत्ति हुई थी और समुद्र मंथन से प्राप्त यह वृक्ष देवराज इन्द्र को दे दिया गया था और इन्द्र ने इसकी स्थापना सुरकानन वन जो की (हिमालय के उत्तर में) में कर दी थी और पद्मपुराण के अनुसार पारिजात ही कल्पतरु है।
वही कॉलेज के वनस्पति विज्ञान के प्रोफेसर ने कहा है कि ओलिएसी कुल के इस वृक्ष का वैज्ञानिक नाम ओलिया कस्पीडाटा है और यह यूरोप के साथ अफ्रीका फ्रांस और इटली में बहुतायत मात्रा में पाया जाता है यह दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया में भी पाया जाता है और भारत देश में इसका वानस्पतिक नाम बंबोकेसी है।जानकारों के मुताबिक यह एक बेहद मोटे तने वाला फलदायी यब वृक्ष है जिसकी टहनी लंबी होती है और पत्ते भी लंबे होते हैं इसका फल भी किसी छोटी- सी गेंद में निकले हुए असंख्य रुओं की तरह होता है और यह वृक्ष लगभग 70 फुट ऊंचा होता है और इसके तने का व्यास 35 फुट तक हो सकता है। 150 फुट तक इसके तने का घेरा नापा गया है यह अपनी एक औषध गुणों के कारण कल्पवृक्ष की पूजा की जाती है यह एक परोपकारी मेडिस्नल-प्लांट है अर्थात दवा देने वाला वृक्ष है इसमें संतरे से 6 गुना ज्यादा विटामिन ‘सी’ होता है गाय के दूध से दोगुना कैल्शियम होता है और इसके अलावा सभी तरह के विटामिन पाए जाते हैं।
मुजफ्फरपुर के एलएस कॉलेज में लगा हुआ यह पेड़ करीब 35 वर्ष पुराना है और यहां की जलवायु पूरी तरह सुरक्षित और मजबूत है फिलहाल इस पेड़ को लेकर शोध वनस्पति विज्ञान के द्वारा किया जा रहा है और ऐसी अवधारणा है कि यह एक आध्यात्मिक महत्त्व वाला पेड़ हो सकता है।